मंगलवार, 2 सितंबर 2014

तब्दील हुए मंजर, पैग़ाम वही है

पाला भरम कि रात लाएगी नयी  सुबह,
पर मुफ़लिसी के दौर सुबहोशाम वही है । 

हर कश्मकश का आख़री ज़बाब एक सा,   
हिक़मत तो है बदल रही, अंजाम  वही है । 

सूरज है सर पै तप रहा, भट्ठी बनी जमीं,
जो नाम दें, क़ुबूल, मग़र काम वही है । 

हर   चीज़  के हैं  मोल  आसमान छू रहे,     
दिन-भर के पसीने का, मगर, दाम वही है । 

हाँ, आप से बदल के वो हुज़ूर बन गए, 
हम तुम से तू बने, हमारा नाम वही है । 

मुंसिफ़ बदल गए हैं, अदालत बदल गयी,
कानून वही है, सर-ओ- इल्ज़ाम वही है ।       

चीतों की ज़गह भेंड़िये, पर भेड़ के लिए  
तब्दील हुए मंजर, पैग़ाम वही है । 


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